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माता वैष्णो देवी (त्रिपुर सुंदरी) जी की गाँव लावन पुरा में आगमन की कथा

माता रानी ने रामगोपाल कर्ण जी को स्वप्न दिया कि उठो वत्स आंखे खोलो माता त्रिकुटा देवी की दिव्य प्रतिमाएँ कई शताब्दियों से तुम्हारे गाँव के पास जंगलों में छुपी हुई है उन्हें वहां से उठा कर अपने गांव में घर के समीप स्थापित करो माता रानी के कन्या स्वरूप ने स्वप्न में कहा कि ये प्रतिमाएं कई सदियों पूर्व आपके पूर्वज सामंत पूर्णिया ने अपनी देवगढ़ घड़ी में माता त्रिकुटा का भव्य मंदिर बनवाया जिसमें माता की तीन प्रतिमाएं स्वर्ण आभूषणों से सजी धजी थी उनमें से एक प्रतिमा महालक्ष्मी जी की थी जो स्वर्ण की बनी हुई थी बाकी दो मूर्तियां महाकाली जी एवं महासरस्वती जी जो कि लाल पत्थर की शिला पर बनाई गई थी जिन्हें स्वर्ण आभूषणों से सजाया गया था यह देवी मंदिर उस दौर का बहु प्रसिद्ध धनवान देवी मंदिर था फिर पड़ोसी राज्य में मुगलों का आक्रमण हुआ और कई मंदिर तोड़ दिए गए और उनकी अपार संपदा लूट ली गई इस कृत्य से भयभीत सामंत पूर्णिया ने अपनी देवगढ़ गढ़ी के मंदिर से दो पत्थर की मूर्तियां निकाल कर राज्य के बाहर जंगलों में छुपा दी जिन्हें बाद में जंगल से चोर चुरा ले गए और खच्चर पर लाद कर कहीं बेचने ले जा रहे थे उसी व...

त्रिपुरी कल्चुरी वंश से कर्ण वंश का संबंध

त्रिपुरी कल्चुरी वंश को समझने के लिए हैहय वंश को शुरुआत से समझते है 1. पौराणिक/प्राचीन पाँच प्रमुख कुल (शाखाएँ) पुराणों के अनुसार, हैहय वंश मुख्य रूप से पाँच प्रमुख कुलों या शाखाओं में विभाजित था: 1वीतिहोत्र (Vitihotra) 2.शर्यात (Sharyata) 3.भोज (Bhoja) 4.अवन्ति (Avanti) 5.तुंडिकेरा (Tundikera) इसकी प्रारंभिक और सबसे प्रसिद्ध राजधानी नर्मदा नदी के तट पर स्थित महिष्मती (वर्तमान महेश्वर, मध्य प्रदेश) थी, और इसके सबसे प्रतापी राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) थे। 2. ऐतिहासिक एवं मध्यकालीन कलचुरी (हैहय) शाखाएँ 10वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान, हैहय वंश के वंशज कलचुरी नाम से उभरे और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इनकी प्रमुख शाखाएँ स्थापित हुईं: 1.त्रिपुरी के कलचुरी (चेदी शाखा) यह मध्य प्रदेश के ऊपरी नर्मदा घाटी क्षेत्र (त्रिपुरी/जबलपुर के पास) में केंद्रित थी।इसकी स्थापना कोकल्ल प्रथम ने की थी। जिससे आगे चलकर कर्णवंश की वंशावली जुड़ गई और कर्ण उपनाम का प्रचलन हुआ त्रिपुरी के कलचुरियों की प्रमुख ऐेतिहासिक वंशावली कोक्कल प्रथम | शंकरगण प्रथम | वालहर्ष ...

माता त्रिपुर सुंदरी एवं वैष्णो देवी (लावन पुरा) में संबंध

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लावन पुरा में प्राप्त वैष्णो देवी की दो दिव्य मूर्तियां माता महाकाली एवं माता महासरस्वती की मूर्तियों में नीचे लिखे शिलालेख की आकृतियाँओ को ठीक से देखा जाएं तो समझ आता है कि दोनों मूर्तियों में समान चार वृषभ(वैल ) जैसी आकृतियाँ उकेरी हुई है ठीक ऐसी ही वृषभ (बैल) की आकृतियाँ त्रिपुरी कलचुरि वंश के राजा कर्ण देव के शिलालेखों पर देखने को मिलती है जो इसकी पुष्टि करता है कि यह मूर्तियां त्रिपुरी कलचुरि वंश से संबधित है मध्यप्रदेश के जबलपुर में प्राचीन नगर तेवर में 45 वर्ष पूर्व खंडहरों से 1100 ईस्वी की जो मां त्रिपुर सुन्दरी (परम ज्ञानी महर्षि दुर्वासा जी की आराध्य देवी) की मूर्तियां मिली है यह उनके ही समकालीन प्रतीत होती है वृषभ से ऊपर की पंक्ति में मां त्रिपुर सुंदरी की सेनापति देवी वाराही (दण्डिनी) के आकृति उकेरी गई है जिनके हाथों में हल रूपी शस्त्र विद्यमान है प्रथम पंक्ति में गौर से देखोगे तो दिखेगा वाराही देवी के सामने घोड़े और मनुष्य जैसी एक आकृति प्रतीत होती है शायद यह भगवान हयग्रीव की आकृति उकेरी गई हैं क्योंकि ललित उपाख्यान में भगवान हयग्रीव ने महर्षि अगस्त्य को माँ ...

सूर्य पुत्र कर्ण की मित्रता ,दानवीरता एवं वचन और संकल्प

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महाभारत ग्रंथ के अंतर्गत वन पर्व उपपर्व: कुण्डलाहरण पर्व अध्याय: 300 (गीताप्रेस के हिंदी संस्करण में) प्रमुख श्लोक: 5–16, विशेषकर श्लोक 14–15 में तथा BORI Critical Edition में यही प्रसंग वन पर्व के अध्याय 284 में मिलता है। कि सूर्यदेव स्वप्न में कर्ण को दर्शन देकर बताते हैं कि इन्द्रदेव ब्राह्मण का वेश धारण करके उनसे कवच और कुण्डल माँगने आने वाले हैं। सूर्यदेव कर्ण को उन्हें दान न देने की सलाह भी देते हैं। किंतु सूर्य पुत्र कर्ण ने सबकुछ जानकर भी अपने कवच -कुण्डल को इन्द्रदेव को दान में दे दिया ताकि विधाता के द्वारा प्रस्तावित पुनः धर्म स्थापना की नियति में कोई अवरोध उत्पन्न न हो एवं भगवान् श्री कृष्ण के द्वारा धर्म स्थापना के लिये लिया गया प्रण पूर्ण हो सके क्या अब भी आपको नहीं लगता कि कर्ण ने नियति वश अधर्म के पक्ष में होते हुए भी सदैव स्वेच्छा से धर्म का पक्ष लिया कर्ण ने देवराज इंद्र से कवच - कुण्डल दान के उपरान्त वासवी (अमोघ अस्त्र) का वरदान इसलिए मांगा ताकि मित्रता कलंकित न हो और कौरव पक्ष को मज़बूती मिल सके अन्यथा संसार कहेगा कि कर्ण ने धर्म की खातिर स्वयं अपने आप को ढाल विहीन...

सूर्य पुत्र कर्ण के जन्म की दिव्यता

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महऋषि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत वन पर्व के ३०७ वे अध्याय के अनुसार सूर्य पुत्र कर्ण का जन्म माघ प्रतिपदा से ठीक दसवे माह में श्रृष्टि के रचयिता भगवान् ब्रह्मा के पुत्र महऋषि कश्यप और देवी अदिति के पुत्र आदित्य (देव) सूर्य और मनुष्य रूप में स्त्री देवी कुंती के समागम से दैवीय चमत्कारिक रूप से देवी कुंती का कन्या भाव भंग किए बिना हुआ था यह समागम पूर्णतः दोष रहित एवं मनुष्यों की समझ से परे दैवीय हस्तक्षेप पर आधारित था किंतु प्राचीन काल से ही कर्णवंशी किसी महत्व विशेष के कारण सामुदायिक परंपरा के रूप में गंगा दशहरा को कर्ण जयंती मनाते आ रहे है और यही परंपरा शुरुआत से वर्तमान तक चली आ रही है सूर्य पुत्र कर्ण जन्म उस काल में हुआ था जब एक मंत्र मात्र के उच्चारण से सहस्त्रों मील दूर अंतरिक्ष से वर्तमान युग में स्थिर कहे जाने वाला खगोलीय पिण्ड सूर्य क्षण भर में पृथ्वी आ पहुंचते थे इसलिए सूर्य पुत्र कर्ण के जन्म की कल्पना कर उनके जन्म पर उंगली उठाने का सामर्थ्य वर्तमान युग के मनुष्यों में नहीं है इसके अतिरिक्त द्वापुर युग से पहले भी सनातन धर्म में त्रेता युग में भी श्रृंगी ऋषि द्वारा किए गए य...

कर्णवंशी क्षत्रिय ( कर्ण राजपूत ) समुदाय के अस्तित्व की प्रमाणिक पुष्टि

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  20 वी शताब्दी में कर्ण वंश का अस्तित्व  चौथी शताब्दी में भारतेंदु हरिचंद्र में कर्ण वंश के अस्तित्व का प्रमाण दूसरी शताब्दी में मुद्रा राक्षस से कर्ण वंश के अस्तित्व का प्रमाण  छठी शताब्दी में कर्ण वंश की पुष्टि राजतरंगिणी के पंचम तरंग से   भारतेन्दु समग्र के पेज क्रमांक ३७६ में एवं मुद्राराक्षस के पेज क्रमांक ४४३ में इतिहासकार 200; ईस्वी से 400 ईस्वी तक कर्णवंशी बौद्ध राजाओं को मगध का राजा बताया है राजतरंगणी के पंचम तरंग के पेज क्रमांक ३८३ में लिखा हुआ है छठी शताब्दी के कर्णवंश का शासन राजस्थान के गुर्जर प्रदेश पर था उडड़ नामक राजकुमार ने दक्षिण गुर्जर में भड़ौच का राज्य स्थापित किया था इसके अलावा सप्तम तरंग एवं अष्टम तरंग में भी कर्ण नाम के राजाओं का वर्णन है कुछ इतिहासकार इन्हें कल्चुरी राजा कर्ण जोकि त्रिपुरी चेदी नरेश थे उनका वर्णन मानते है

सूर्य पुत्र कर्ण का सामर्थ्य और शौर्य गाथा

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सूर्य पुत्र कर्ण का सामर्थ्य और शौर्य गाथा महऋषि वेद व्यास जी द्वारा रचित संक्षिप्त महाभारत से कुछ इस प्रकार है  १.युधिष्ठिर ने खुद कहा है कर्ण विश्वव्यख्यात महारथी और संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है (कर्ण पर्व पेज ४८) २. अर्जुन कहते है हे महा वाहे श्री कृष्ण कर्ण द्वारा चलाए गए भार्गव अस्त्र का नाश इस युद्ध में किसी तरह नहीं किया जा सकता तब श्री कृष्ण अर्जुन को वहां से युधिष्ठिर के खेमे में ले आए उनका उद्देश्य था जब कर्ण युद्ध में थक जाएगा तब अर्जुन उनसे युद्ध करने में सक्षम हो जाएंगे (कर्ण पर्व पेज ४७) 3. युधिष्ठिर कहते है है अर्जुन कृष्ण तुम्हारे रथ के सारथी है तुम्हारा रथ अग्नि देव की भेट है , तुम्हारे पास गांडीव जैसा धनुष है तुम्हारे पास महान दिव्य अस्त्र शस्त्र है फिर भी तुम कर्ण से डर कर भाग आए धिक्कार है तुम्हारी वीरता पर (कर्ण पर्व पेज न.५०) 4. अर्जुन कहते है सात्यकि और दृष्टदुमन मेरे रथ के पहिए की रक्षा करे तथा राजकुमार युद्धा मन्यू और उत्तमौजा मेरे पृष्ठ भाग की रक्षा करे फिर में कर्ण के साथ युद्ध करूंगा (कर्ण पर्व पेज न.५०) 5.कर्ण पर्व में यह भी कहा गया है कि कर्ण ने गु...