कविता (बैक कवर)
किसने कहा कि जन्म मनुज की पहचान बताया करता है पुरुषार्थों का स्वर्ण सदा इतिहास बनाया करता है। जिसे जगत ने "सूत" कहा, वह देवों का अभिमान बना, जिसे सभा ने ठुकराया, वह रणभूमि की शान बना। वंश नहीं, वैभव नहीं, मनुष्य का परिचय कर्म रहे। दान रहे तो कर्ण-सा हो, धर्म रहे तो मर्म रहे। अपमानों की आग मिले तो सोना बनकर तप जाना, अपने हिस्से का सूर्य स्वयं बन, अंधियारे से लड़ जाना। इतिहासों में नाम वही है जो आँधियों से भिड़ जाता है, अपने लिए नहीं, जग के लिए जो जीवन भर जल जाता है। आओ, आज प्रण लें मिलकर— नहीं झुकेंगे अन्यायों पर, नहीं बिकेंगे अभिमानों में, स्वाभिमान की ज्वाला लेकर चलेंगी आने वाली संताने।