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अंग देश का इतिहास

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कर्णवंशियों के इतिहास को समझने के लिए पहले अंग देश के इतिहास को समझना होगा अंग देश या अंग महाजनपद' प्राचीन जनपद था, जो बिहार राज्य के वर्तमान भागलपुर और मुंगेर ज़िलों का समवर्ती था। अंग की राजधानी चंपा थी। आज भी भागलपुर के एक मुहल्ले का नाम चंपानगर है। महाभारत की परंपरा के अनुसार अंग के वृहद्रथ और अन्य राजाओं ने मगध को जीता था, पीछे बिंबिसार और मगध की बढ़ती हुई साम्राज्य लिप्सा का वह स्वयं शिकार हुआ। राजा दशरथ के मित्र लोमपाद और महाभारत के अंगराज कर्ण ने वहाँ राज किया था। बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तरनिकाय' में भारत के बुद्ध पूर्व सोलह जनपदों में अंग की गणना हुई है। अंग देश का सर्वप्रथम नामोल्लेख अथर्ववेद 5,22,14 में है- गंधारिभ्यं मूजवद्भयोङ्गेभ्यो मगधेभ्य: प्रैष्यन् जनमिव शेवधिं तवमानं परिदद्मसि। इस अप्रशंसात्मक कथन से सूचित होता है कि अथर्ववेद के रचनाकाल (अथवा उत्तर वैदिक काल) तक अंग, मगध की भांति ही, आर्य-सभ्यता के प्रसार के बाहर था, जिसकी सीमा तब तक पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश तक ही थी। महाभारतकाल में अंग और मगध एक ही राज्य के दो भाग थे। शांति पर्व 29,35 (अंगं ब...

सूर्य पुत्र कर्ण के जन्म की दिव्यता

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महऋषि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत वन पर्व के ३०७ वे अध्याय के अनुसार सूर्य पुत्र कर्ण का जन्म माघ प्रतिपदा से ठीक दसवे माह में श्रृष्टि के रचयिता भगवान् ब्रह्मा के पुत्र महऋषि कश्यप और देवी अदिति के पुत्र आदित्य (देव) सूर्य और मनुष्य रूप में स्त्री देवी कुंती के समागम से दैवीय चमत्कारिक रूप से देवी कुंती का कन्या भाव भंग किए बिना हुआ था यह समागम पूर्णतः दोष रहित एवं मनुष्यों की समझ से परे दैवीय हस्तक्षेप पर आधारित था किंतु प्राचीन काल से ही कर्णवंशी किसी महत्व विशेष के कारण सामुदायिक परंपरा के रूप में गंगा दशहरा को कर्ण जयंती मनाते आ रहे है और यही परंपरा शुरुआत से वर्तमान तक चली आ रही है सूर्य पुत्र कर्ण जन्म उस काल में हुआ था जब एक मंत्र मात्र के उच्चारण से सहस्त्रों मील दूर अंतरिक्ष से वर्तमान युग में स्थिर कहे जाने वाला खगोलीय पिण्ड सूर्य क्षण भर में पृथ्वी आ पहुंचते थे इसलिए सूर्य पुत्र कर्ण के जन्म की कल्पना कर उनके जन्म पर उंगली उठाने का सामर्थ्य वर्तमान युग के मनुष्यों में नहीं है इसके अतिरिक्त द्वापुर युग से पहले भी सनातन धर्म में त्रेता युग में भी श्रृंगी ऋषि द्वारा किए गए य...

कर्णवंशी क्षत्रिय ( कर्ण राजपूत ) समुदाय के अस्तित्व की प्रमाणिक पुष्टि

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  20 वी शताब्दी में कर्ण वंश का अस्तित्व  चौथी शताब्दी में भारतेंदु हरिचंद्र में कर्ण वंश के अस्तित्व का प्रमाण दूसरी शताब्दी में मुद्रा राक्षस से कर्ण वंश के अस्तित्व का प्रमाण  छठी शताब्दी में कर्ण वंश की पुष्टि राजतरंगिणी के पंचम तरंग से यहां गौर करने वाली बात यह है कि क्षत्रिय समाज एवं गुर्जर समाज का इतिहास इसीलिए भ्रमित हो जाता है क्योंकि गुर्जर प्रदेश पर राज करने के कारण अन्य क्षत्रिय राजाओं को कहीं कहीं गुर्जर सम्राट के नाम से संबोधित किया गया है जैसे कि अंग राज कर्ण, अयोध्या नरेश दशरथ, छेदी नरेश शिशुपाल, मद्रराज शल्य इसी प्रकार कर्ण वंश के राजाओं को गुर्जर प्रदेश पर राज करने की वज़ह से कही कही गुर्जर सम्राट भी कहा गया है किंतु गुर्जर जाति से उनका कोई संबध नहीं क्योंकि गुर्जर प्रदेश और गुर्जर जाति भारतीय इतिहास में अपना पृथक ऐतिहासिक महत्व रखते है हालांकि गुर्जर प्रदेश गुर्जरों के अधिपत्य में भी रहा है और गुर्जर जाति के स्वाभिमान से भी जुड़ा हुआ है किंतु गुर्जर प्रदेश पर अन्य क्षत्रिय राजाओं का भी अधिपत्य रहा है इसीलिए उन क्षत्रिय राजाओं को गुर्जर सम्राट की उपाधि ...

सूर्य पुत्र कर्ण का सामर्थ्य और शौर्य गाथा

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सूर्य पुत्र कर्ण का सामर्थ्य और शौर्य गाथा महऋषि वेद व्यास जी द्वारा रचित संक्षिप्त महाभारत से कुछ इस प्रकार है  १.युधिष्ठिर ने खुद कहा है कर्ण विश्वव्यख्यात महारथी और संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है (कर्ण पर्व पेज ४८) २. अर्जुन कहते है हे महा वाहे श्री कृष्ण कर्ण द्वारा चलाए गए भार्गव अस्त्र का नाश इस युद्ध में किसी तरह नहीं किया जा सकता तब श्री कृष्ण अर्जुन को वहां से युधिष्ठिर के खेमे में ले आए उनका उद्देश्य था जब कर्ण युद्ध में थक जाएगा तब अर्जुन उनसे युद्ध करने में सक्षम हो जाएंगे (कर्ण पर्व पेज ४७) 3. युधिष्ठिर कहते है है अर्जुन कृष्ण तुम्हारे रथ के सारथी है तुम्हारा रथ अग्नि देव की भेट है , तुम्हारे पास गांडीव जैसा धनुष है तुम्हारे पास महान दिव्य अस्त्र शस्त्र है फिर भी तुम कर्ण से डर कर भाग आए धिक्कार है तुम्हारी वीरता पर (कर्ण पर्व पेज न.५०) 4. अर्जुन कहते है सात्यकि और दृष्टदुमन मेरे रथ के पहिए की रक्षा करे तथा राजकुमार युद्धा मन्यू और उत्तमौजा मेरे पृष्ठ भाग की रक्षा करे फिर में कर्ण के साथ युद्ध करूंगा (कर्ण पर्व पेज न.५०) 5.कर्ण पर्व में यह भी कहा गया है कि कर्ण ने गुर...

सूर्य पुत्र कर्ण के व्यक्तित्व की व्याख्या भगवत गीता के अनुसार

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   भगवत गीता के १० वे अध्याय के ८ वे श्लोक के अनुसार   अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।। अर्थात्   अहं सर्वस्य प्रभवः ' -- मानस, नादज, बिन्दुज, उद्भिज्ज, जरायुज, अण्डज, स्वेदज अर्थात् जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम यावन्मात्र जितने प्राणी होते हैं, उन सबकी उत्पत्ति के मूल में परम पिता परमेश्वर के रूप में मैं ही हूँ यहां  प्रभव का तात्पर्य है कि मैं सबका 'अभिन्न-निमित्तोपादान कारण' हूँ अर्थात् स्वयं मैं ही सृष्टि रूप से प्रकट हुआ हूँ।  ' मत्तः सर्वं प्रवर्तते ' -- संसार में उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, पालन, संरक्षण आदि जितनी भी चेष्टाएँ होती हैं, जितने भी कार्य होते हैं, वे सब मेरेसे ही होते हैं। मूलमें उनको सत्ता-स्फूर्ति आदि जो कुछ मिलता है, वह सब मेरे से ही मिलता है। जैसे बिजली की शक्ति से सब कार्य होते हैं, ऐसे ही संसार में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका मूल कारण मैं ही हूँ। ' अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते' -- कहने का तात्पर्य है कि साधक की दृष्टि प्राणि मात्र के भाव, आचरण, क्रिया आदिकी तरफ न जाकर उन सब...

कर्णवंशी क्षत्रिय (कर्ण राजपूत ) समुदाय की पहिचान

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कर्णवंशीयों की पहिचान पुराणों के मुताबिक कुछ इस प्रकार हैं  (१.) कर्णवंशियों की प्रथम पहिचान के संबंध में विष्णु पुराण में कहा गया है             उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् | वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः || अर्थात- उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक इस विशाल भू भाग को वर्षों से भारत के नाम से जाना जाता है और यहां निवास करने वाली मनु संततियों को भारतीय कहा जाता है अर्थात हमारी प्रथम पहिचान यह है कि हम भारतीय है (२.) दृत्तीय पहिचान बृहस्पति आगम से जो की विशालाक्ष शिव द्वारा रचित है  हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥ अर्थात् - हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। अतः हिंदू शब्द के लिए बृहस्पति संहिता में लिखा है  ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय: गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:। हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:। अर्थात् - ॐकार’ जिसका मूल मंत्र है और पुनर्जन्म को जो बड़ी दृढ़ता से ...