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सूर्य पुत्र कर्ण के व्यक्तित्व की व्याख्या भगवत गीता के अनुसार

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   भगवत गीता के १० वे अध्याय के ८ वे श्लोक के अनुसार   अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।। अर्थात्   अहं सर्वस्य प्रभवः ' -- मानस, नादज, बिन्दुज, उद्भिज्ज, जरायुज, अण्डज, स्वेदज अर्थात् जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम यावन्मात्र जितने प्राणी होते हैं, उन सबकी उत्पत्ति के मूल में परम पिता परमेश्वर के रूप में मैं ही हूँ यहां  प्रभव का तात्पर्य है कि मैं सबका 'अभिन्न-निमित्तोपादान कारण' हूँ अर्थात् स्वयं मैं ही सृष्टि रूप से प्रकट हुआ हूँ।  ' मत्तः सर्वं प्रवर्तते ' -- संसार में उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, पालन, संरक्षण आदि जितनी भी चेष्टाएँ होती हैं, जितने भी कार्य होते हैं, वे सब मेरेसे ही होते हैं। मूलमें उनको सत्ता-स्फूर्ति आदि जो कुछ मिलता है, वह सब मेरे से ही मिलता है। जैसे बिजली की शक्ति से सब कार्य होते हैं, ऐसे ही संसार में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका मूल कारण मैं ही हूँ। ' अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते' -- कहने का तात्पर्य है कि साधक की दृष्टि प्राणि मात्र के भाव, आचरण, क्रिया आदिकी तरफ न जाकर उन सब...

कर्णवंशी क्षत्रिय (कर्ण राजपूत ) समुदाय की पहिचान

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कर्णवंशीयों की पहिचान पुराणों के मुताबिक कुछ इस प्रकार हैं  (१.) कर्णवंशियों की प्रथम पहिचान के संबंध में विष्णु पुराण में कहा गया है             उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् | वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः || अर्थात- उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक इस विशाल भू भाग को वर्षों से भारत के नाम से जाना जाता है और यहां निवास करने वाली मनु संततियों को भारतीय कहा जाता है अर्थात हमारी प्रथम पहिचान यह है कि हम भारतीय है (२.) दृत्तीय पहिचान बृहस्पति आगम से जो की विशालाक्ष शिव द्वारा रचित है  हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥ अर्थात् - हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। अतः हिंदू शब्द के लिए बृहस्पति संहिता में लिखा है  ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय: गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:। हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:। अर्थात् - ॐकार’ जिसका मूल मंत्र है और पुनर्जन्म को जो बड़ी दृढ़ता से ...

कर्णवंशी क्षत्रिय ( कर्ण राजपूत ) समुदाय का ध्येय वाक्य

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कर्णवंशी क्षत्रिय ( कर्ण राजपूत ) समुदाय का ध्येय वाक्य -" कर्ण ही हमारा स्वाभिमान है "  जो कि सर्व प्रथम ४ अप्रैल २०२१ के दिन रविवार को सतेंद्र सिंह कर्ण S/o श्रद्धेय मुन्नी देवी रामगोपाल कर्ण जी के द्वारा दिया गया है उनका मानना है कर्ण हमारा शरीर है किंतु श्री कृष्ण हमारी आत्मा है

मनु स्मृति के अनुसार सूत शब्द व्युत्पत्ति की व्याख्या

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क्षत्रियाद्विप्रकन्यायां सूतो भवति जातितः। वैश्यान्मागधवैदेहौ राजविप्राङ्गनासुतौ।    ( मनु स्मृति के 10 वें अध्याय का 11वां श्‍लोक ) अर्थात् मनु स्मृति से हमें ज्ञात होता है कि 'सूत' शब्द का प्रयोग उन संतानों के लिए होता था, जो ब्राह्मण कन्या से क्षत्रिय पिता द्वारा उत्पन्न हों। महाभारत पुराण के भीष्म पर्व के 30 वे अध्याय के अनुसार भी महारथी कर्ण सूत पुत्र नहीं थे पालक पिता अधीरथ होने के कारण उन्हें सूत पुत्र कहा जाता था कौन्तेयस्त्वं न राधेयो न तवाधिरथः पिता। सूर्यजस्त्वं महाबाहो विदितो नारदान्मया।। ( भीष्म पर्व ३० वा अध्याय) श्रीकृष्णस्तोत्रं इन्द्ररचितम् - गोर्वधन लीला के समय प्रभु श्री कृष्ण के क्रोध से बचने के लिए और प्रभु श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए देवराज इंद्र ने भक्ति भाव से श्रीकृष्णस्तोत्रं की रचना की जिसे सुन कर प्रभु कृष्ण ने इंद्र की सारी भूल को माफ़ कर दिया था तथा प्रभु श्री कृष्ण ने देवराज इंद्र को यह वरदान दिया कि जो मनुष्य इस स्त्रोत का सच्चे मन से भक्ति भाव से पाठ व स्तुति करेगा उसका में सदैव कल्याण करूंगा  " देवराज इंद्...

कर्णवंशी क्षत्रिय ( कर्ण राजपूतों) के यज्ञोपवीत विधि विधान

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कर्णवंशी क्षत्रिय दुर्गा यज्ञोपवीत धारण करने वाले चंद्रवंशी क्षत्रिय है जो कि मुख्यत: 6 लड़ियों वाला यज्ञोपवीत धारण करते है            यज्ञोपवीत धारण करने का मंत्र यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ।।                  यज्ञोपवीत उतारने का मंत्र एतावद्दिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीर्णत्वात्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम्।।  

कर्णवंशी क्षत्रिय (कर्ण राजपूतों) का ध्वज और प्रतीक चिन्ह

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प्रत्येक राज वंश का एक परचम होता था जिसका मान सम्मान उस राजवंश की प्रजा के लिए अपने प्राणों से भी बढ़कर होता था इसीलिए युद्ध का नृतत्व करते समय हाथों में योद्धा अपने वंश का परचम थामे रहते थे वो इसलिए ताकी उनकी उनकी प्रजा को यह आभास होता रहें कि जो योद्धा समरांगण में अपने प्राणों को हथेली पर ले कर लड़ रहा है वो प्रजा सहित सम्मत राज वंश के मान सम्मान के लिए लड़ रहा है केवल अपने लिए नहीं इसीलिए किसी भी राजवंश की प्रजा कभी भी अपने राजवंश के योद्धाओं का विरोध नही करती थी क्योंकि उन्हें यह पता था कि योद्धाओं से ही समस्त राजवंश का स्वाभिमान हैं इसी उद्देश्य को मद्दे नज़र रखते हुए पुनः कर्णवंश का परचम डिजाइन किया गया है ताकि कुल के सम्मान हेतु युवाओं सहित समाज के समस्त जन मानस में आदर की भावना का संचार किया जा सके परचम कुल /वंश/समुदाय की स्पष्ट पहिचान प्रदर्शित करता है इसलिए परचम का लोगो अर्थात् प्रतीक चिन्ह भ्रम रहित और स्पष्ट रखा गया है  इसलिए कर्णवंशी क्षत्रिय वंश का परचम और प्रतीक चिन्ह - केसरिया ( लाल ) ध्वज पर सूर्य की आकृति के बीचों बीच गर्भ स्थान पर सूर्य पुत्र कर्ण लिखा हुआ है...

कर्णवंशी क्षत्रिय (कर्ण राजपूतों) की वंश नदी है अश्व नदी (आसन नदी)

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अश्व नामक नदी का उल्लेख महाभारत में चर्मण्वती (चंबल ) की सहायक नदी के रूप में है। नवजात शिशु कर्ण को कुंती ने जिस मंजूषा में रखकर अश्व नदी में प्रवाहित कर दिया था जो की बहता हुआ पंचनदे( यमुना, चंबल , सिंध , कुंवारी , पहुज ) ज़िला जालौन उत्तर प्रदेश पर पहुंची थीं पांच नदियों के संगम को गंगा की धारा की संज्ञा दी गई है इसलिए यहां गंगा दशहरा के दिन स्नान कर प्रातः पर्व लेने की प्रथा है यही पर अधिरथ और राधेय मां गंगा दशहरा के दिन प्रातः पर्व लेने के लिए आए थे तो यह मंजूषा उन्हें नदी में स्नान करते वक्त मिला जिसमें वालक कर्ण थे  माता कुंती ने वालक कर्ण को अश्व नदी की गोद में सौंपते हुए अश्व नदी से बालक कर्ण की एक मां की भांति रक्षा करने की प्रार्थना कर अपने गंतव्य तक पहुंचाने का आग्रह किया जिसे अश्वनदी ने स्वीकार किया और मां की भांति ही वालक कर्ण को सकुशल अधिरथ और राधे मां को सुपर्द कर दिया इसलिए कर्णवंशी क्षत्रिय समुदाय अश्वनदी को मां का दर्जा देते है और वंश नदी के रूप में पूजते है क्योंकि अश्व नदी की ममतामई स्नेह पर ही कर्ण वंश की नीव रखी हुई है ' मंजूषा त्वश्वनद्या: साययौं चर्मण्वतीं ...