कर्णवंशी क्षत्रिय ( कर्ण राजपूत ) समुदाय का ध्येय वाक्य



कर्णवंशी क्षत्रिय ( कर्ण राजपूत ) समुदाय का ध्येय वाक्य -"कर्ण ही हमारा स्वाभिमान है"जो कि सर्व प्रथम ४ अप्रैल २०२१ के दिन रविवार को स्वयं की घोषणा के द्वारा दिया गया है कर्णवंशियों का मानना है कर्ण उनका शरीर है क्योंकि वे कर्णवंशी है किंतु श्री कृष्ण उनकी आत्मा है क्योंकि वे सनातनी है ( सनातन धर्म सर्वोपरि की भावना को महत्व देते है) कर्णवंशियों का इतिहास हमे यह शिक्षा देता है कि धर्म के विरुद्ध हो कर कभी कोई विजय नहीं हो सकता चाहे उसे कोई भी वरदान प्राप्त हो तथा स्त्री हर रूप में पूज्यनीय है कर्ण के कंठ से याज्ञसैनी के लिए अपशब्द और मित्र दुर्योधन की मित्रता के लिए रक्त वचन निकले थे इसी लिए इस पूरे कृत्य में कर्ण के कंठ का ही दोष था संक्षेप में: स्वरयंत्र (Larynx) – आवाज़ बनाने वाला मुख्य अंग। स्वरतंत्रियाँ (Vocal Cords) – स्वरयंत्र के अंदर स्थित दो पतली पेशीय परतें, जिनके कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। कंठ (Throat) – गले का वह भाग जिसमें स्वरयंत्र स्थित होता है। इसीलिए प्रभु श्री कृष्ण ने कर्ण को दोष मुक्त करने के लिए अर्जुन से कर्ण के कंठ की ओर इशार करते हुए कहा था "अंजलिका अस्त्र चलाओ पार्थ मुक्त करो अंग राज कर्ण को उनके द्वारा मित्र दुर्योधन को दिए हुए रक्त वचन से" क्योंकि सनातन धर्म में पाप मुक्ति के लिए एक ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है और वो है सच्चा पश्चाताप और स्वीकृति: यदि कोई गलती या पाप हो जाए, तो सबसे पहला कदम उसे स्वीकार करना और हृदय से पश्चाताप (प्रायश्चित) करना है । भविष्य में उसे न दोहराने का संकल्प ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है इसी उद्देश्य की प्रतिपूर्ति हेतु कर्ण ने अंत तक दुर्योधन का पक्ष लिया था वो जानते थे कि वासुदेव श्री कृष्ण के इशारे पर अनुज अर्जुन के हाथों ही उन्हें इन पापों से मुक्ति मिल सकती है जो पाप नियति ने कर्ण से करवाए।


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