कर्णवंशी क्षत्रिय (कर्ण राजपूतों) के प्रचलित वंशानुगत गोत्र
कर्णवंश चन्द्र वंश की एक बहुत ही प्राचीन और विशाल शाखा है। गोत्रों की विविधता और उनकी विशालता इस बात को दर्शाती है कि यह वंश समय के साथ कितना विस्तृत हुआ है। मूलतः प्राचीन काल में सूर्यपुत्र कर्ण के वंशजों को कर्णवंशी कहा गया। सूर्य पुत्र कर्ण ने चंद्रवंशियों के उत्तराधिकारी के रूप में अंग देश के सम्राट की गद्दी संभाली थी जो कि चंद्रवंश की उपशाखा ययाति वंश की प्रमुख क्षत्रिय शाखा थी। गोत्रों का विस्तार: वैदिक और पौराणिक काल में जब एक कुल या परिवार बढ़ता है , तो नई शाखाएं (उप-कुल या गोत्र) बनती है । चन्द्र वंश में भी कई शाखाएं है उन शाखाओं की भी कई उप शाखाएं है जैसे कि यदुवंश में अनेक शाखाएं थीं—जैसे वृष्णि, अंधक, सात्वत, कुकुर और भोज । यही कारण है कि आज यादव समाज में भी कई अलग-अलग गोत्र (जैसे कश्यप, अत्री, धनगर, आहिर, गोल्ला, आदि) पाए जाते हैं। उसी प्रकार कर्णवंश में भी कई गोत्र पाए जाते है जो वैवाहिक परंपरा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कर्णडेरा कई क्षेत्रीय कबीलों का एक समूह था। जोकि विदेशी आक्रमणों के चलते एक हो गए थे इस प्रकार कर्णडेरे समुदाय के गोत्रों का विस्तार हो गया जबकि कर्णवंशी क्षत्रिय ( कर्ण राजपूतों ) का मुख्य गोत्र कश्यप है जोकि महर्षि कश्यप के नाम पर है कश्यप (कर्ण सूर्य देव के पुत्र थे तथा सूर्य देव के पिता महऋषि कश्यप के थे जो कि ब्रह्म देव के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र थे इसीलिए कर्णवंशियों का मुख्यत: गोत्र कर्ण के दादा अर्थात् सूर्य देव के पिता के नाम पर कश्यप है) तथा प्रमुख उपगोत्र कुछ इस प्रकार है :- गहलौत, बड़गूजरे, कुशवाह, पवार, यादव (जादव),तोमर(तंवर),भाटी ,कटारे, कैमले,पिथौरिया, शिशौदिया (सासना),चौहान,लोहमोड ,दायना, गौर, मौर्य (मोरी), अमेही, अंबेई (अम्बे) , कुलाया, निर्वाण, कूकरे, असारसी, भारद्वाज, बेलई, थानेसरा, कुलवी, सिवाल, चाखा, मोहाल, रीठा, जलाया, लकवाल, महलाना (महलूना) , मठसिंघला, छजेले, चंदेले, दादले, सिंघले, भौयले, बाछल फूलेल, सांखला, झाला, गोरे (गोरुवा) ,लोधड़े, धाकड़े, बांदरे, जाहूरे, जाबरे, गूजरे , सांवरे, नुनेरे, नीमले, आमले, तीतरे, तिथौरे, सुनहरे, सुनेरे, जासुरे, मौहाबरे, भेड़रे , कटारे (कटारिया ) , बौसरे, बासले, पेठे, टुकरेले, खड़ेले, खोबाड़, बेनवाल (बहिनबार), काशनवाल, चावक, चिरमोटे, चमोटे, चमोले, कनेरे, कनखरे, रैवाडे , बड़ेसरे, बरेले, हांसले, पाथरे (पथरिया, पिथोरिया) , भाटी, भेनिया, फैनिया, सुकरू, कदम, कदमीले, सैंमले, सेंतले, नाटले, मौहसरे, सुरेले, आंसले (आंसुरे) , कूतरे, छौकर, डांगर (डांगरे) , गेंडे, नारियल, नीर, पुंडीर, उनिया, सारश्वत, कौंडल, मौरध्वज, संकल्प, कश्यप, परिछारी, चावला, चावक, हिन्नोटिया, बनचर, थंदेले , माहुरे इत्यादि गोत्र और भी है सनातन हिन्दू धर्म में पौरोहित्य-परंपरा के अनुरूप किसी भी व्यक्ति का गोत्र उसके वंश या मूल ऋषि परंपरा को दर्शाता है कश्यप गोत्र सबसे प्राचीन और प्रमुख गोत्रों में से एक है, जिसे इतना व्यापक और विस्तृत माना जाता है कि यदि किसी व्यक्ति को अपने कुल या मूल गोत्र का ज्ञान न हो, तो उसका गोत्र 'कश्यप' ही मान लिया जाता है और पुरोहित "अमुख गोत्र कश्यप" बोल कर पूजा पाठ संपन्न करते है

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