सूर्य पुत्र कर्ण की मित्रता एवं दानवीरता

महाभारत ग्रंथ के अंतर्गत पर्व: वन पर्व उपपर्व: कुण्डलाहरण पर्व अध्याय: 300 (गीताप्रेस के हिंदी संस्करण में) प्रमुख श्लोक: 5–16, विशेषकर श्लोक 14–15 में तथा BORI Critical Edition में यही प्रसंग वन पर्व के अध्याय 284 में मिलता है। कि सूर्यदेव स्वप्न में कर्ण को दर्शन देकर बताते हैं कि इन्द्रदेव ब्राह्मण का वेश धारण करके उनसे कवच और कुण्डल माँगने आने वाले हैं। सूर्यदेव कर्ण को उन्हें दान न देने की सलाह भी देते हैं। किंतु सूर्य पुत्र कर्ण ने सबकुछ जानकर भी अपने कवच -कुण्डल को इन्द्रदेव को दान में दे दिया ताकि विधाता के द्वारा प्रस्तावित पुनः धर्म स्थापना की नियति में कोई अवरोध उत्पन्न न हो एवं भगवान् श्री कृष्ण के द्वारा धर्म स्थापना के लिये लिया गया प्रण पूर्ण हो सके क्या अब भी आपको नहीं लगता कि कर्ण ने नियति वश अधर्म के पक्ष में होते हुए भी सदैव स्वेच्छा से धर्म का पक्ष लिया कर्ण ने देवराज इंद्र से कवच - कुण्डल दान के उपरान्त वासवी (अमोघ अस्त्र) का वरदान इसलिए मांगा ताकि मित्रता कलंकित न हो और कौरव पक्ष को मज़बूती मिल सके ये कैसी नियति है कर्ण का सम्पूर्ण जीवन सदैव उनकी प्रतिज्ञाओं और संकल्प पर ही आधारित रहा क्योंकि मित्र के प्रति रक्तवचन के रूप ली प्रतिज्ञा ने कर्ण को अधर्म के पक्ष में खड़ा अवश्य कर दिया किन्तु निस्वार्थ दान के संकल्प ने उन्हें पुनः धर्म के पक्ष में लाकर खड़ा कर दिया था

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