महाभारत युद्ध के 13 वे दिन की दु: खद व्याख्या
महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत पुराण के हिंदी अनुवाद संक्षिप्त महाभारत के अनुसार पितामह भीष्म जब शरशय्या पर लेट गये उसके बाद 13 वे दिन गुरु द्रोणाचार्य को कौरव सेना का प्रधान सेनापति बनाया गया तत्पश्चात गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने की मंशा से चक्रव्यू की रचना की किंतु 16 वर्ष के एक तरुण बालक सुभद्रा नन्दन अभिमन्यु ने अपना युद्ध कौशल दिखाते हुए चक्रव्यूह भेद डाला और धर्मराज युधिष्ठिर के प्राणों की रक्षा की
महाभारत पुराण के द्रोण पर्व के अंतर्गत अध्याय 48-49 अभिमन्यु वध पर्व में वर्णन किया गया हैं कि सेनापति द्रोणाचार्य के नेतृत्व में सात महारथियों ने नियमों के विरुद्ध जा कर वीर योद्धा अभिमन्यु का वध किया अभिमन्यु पर्व में स्पष्ट लिखा हुआ है सेनापति द्रोणाचार्य ने ही कर्ण को अभिमन्यु के धनुष की प्रत्यंचा काटने और उसे रथ विहीन करने का आदेश दिया था सेनापति के आदेश को स्वीकारना कर्ण की विवशता थी और इसी विवशता के कारण अभिमन्यु वध के इस कुकर्म में कर्ण का नाम जुड़ गया जबकि द्रोण पर्व के अंतर्गत अध्याय 72-82 प्रतिज्ञा पर्व में सूत जी ने स्पष्ट लिखा हैं अर्जुन से धर्मराज युधिष्ठिर कहते है भगवान् शंकर के दिये हुए वरदान के कारण जयद्रथ ने श्रेष्ठ पाण्डव योद्धाओं को चक्रव्यूह में प्रवेश नहीं करने दिया और उन्हें अंत तक रोके रखा इस बीच अभिमन्यु ने बड़े साहस पूर्वक सात महारथियों से युद्ध किया पहले एक हज़ार हाथी, घोड़े, रथी, मनुष्यों का संहार किया फ़िर आठ हज़ार रथी और नौ सौ हाथियों का संहार किया तत्पश्चात दो हज़ार राजकुमारों तथा बहुत से अज्ञात वीरों को मारकर राजा बृहदल को भी स्वर्ग लोक का अतिथि बनाया इसके उपरांत सेनापति गुरु द्रोण की आज्ञा पर कर्ण ने अभिमन्यु के धनुष की प्रत्यंचा काट दी तत्पश्चात निशस्त्र एवं थकी हुई अवस्था में दुर्योधन पुत्र ने पीछे से अभिमन्यु के सर पर गदा से बार कर पुत्र अभिमन्यु के प्राण हर लिये



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