कर्णवंशी क्षत्रिय (कर्ण राजपुतों ) की कुलदेवी महाकाली मां कालिका
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| स्वप्न दे कर आई मां वैष्णो देवी की दिव्य मूर्तियां ग्राम लावन का पुरा |
कर्णवंशी क्षत्रिय (कर्ण राजपूतों) की कुलदेवी माता महाकाली कालिका देवी
नाम : माता कालिका
शस्त्र : त्रिशूल और तलवार
वार : शुक्रवार
दिन : अमावस्या
ग्रंथ : कालिका पुराण
मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा
दुर्गा का एक रूप : माता कालिका 10 महाविद्याओं में से एक
मां काली के 4 रूप हैं- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली।
राक्षस वध : माता ने महिषासुर, चंड, मुंड, धूम्राक्ष, रक्तबीज, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों के वध किए थे।
ध्यान दे :-
महारथी कर्ण की आराध्य देवी मां कालिका थी - मंदिर उज्जैन (गढ़ कालिका )
महारथी कर्ण की दिग्विजय यात्रा के दौरान उज्जैन से 60 km दूर सहजापुर जिले के तराना तहसील में करेड़ी गांव में दीन दुखियों के उत्थान के लिए उन्होंने अपनी आराध्य देवी कालिका की तपस्या कर प्रतिदिन सवामन सोना प्राप्त करने का वरदान प्राप्त किया वहां की स्थानीय मान्यता यह भी है कि दीन दुखियों के उत्थान की मंशा हेतु माता को प्रसन्न करने के लिए सूर्य पुत्र कर्ण ने स्वयं को खोलते हुए तेल की कढ़ाही में समर्पित कर दिया था यह देख माता प्रसन्न हो गई और साक्षात प्रकट हो गई और कर्ण पर अमृत का छिड़काव कर उन्हें बचा लिया तथा सबा मन सोना प्रति दिन प्राप्त करने का वरदान प्रदान किया
सोना अर्थात् कनक
कनक प्रदान करने वाली मां अर्थात् कनकेश्वरी देवी इस प्रकार करेडी गांव में कालिका माता कनकेश्वरी नाम से पूजी जाने लगी
उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर जिले के डिवाई के निकट गंगा तट पर स्थित ऐतिहासिक गांव वर्तमान नाम कर्णवास में सूर्य पुत्र कर्ण सुबह स्नान के उपरान्त अपनी आराध्य देवी मां कालिका के चरणों में जल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त कर एक शिला पर बैठ कर जनकल्याण के लिए सवामन सोना दान किया करते थे इसलिए कर्णवाश में स्थापित आराध्य देवी कालिका माता कल्याणी के नाम से प्रसिद्ध हो गई आज भी कर्णवाश में माता कल्याणी का भव्य मंदिर बना हुआ है
प्राचीन काल में कबीलों के पलायन और प्रवास के कारण कई समुदाय के निवास स्थानो में परिर्वतन हो गया और लोग अपने जीविका अनुरूप देश के विभिन्न भागों में यत्र- तत्र वश गए
ग्वालिर स्टेट के मध्य निवासरत लोगों ने सिंध नदी के तट पर बघेली बहादुरपुर में मां कालिका देवी की स्थापना की जिसका अपना एक ऐतिहासिक महत्व है जहां आज भी ग्वालियर स्टेट के अंतर्गत आने वाली कई राजपूत जातियां कुलदेवी के रूप में शादी विवाह और बच्चे होने की की पूजा देने जाते है एक असमंजस्य ये भी है कुछ इतिहासकार माँ त्रिपुर सुंदरी (जिन्हें माता वैष्णो देवी का प्रतिरूप माना जाता है) को भी भी कर्णवंशियों की कुलदेवी मानते है जबकि वर्तमान में कर्णवंशी मां कालिका को ही कुलदेवी के रूप में पूज रहे है किन्तु ग्वालियर से महज़ 60 km दूर गाँव लावन पुरा आरोन जिला ग्वालियर मध्य प्रदेश में कर्णवंशी समुदाय के एक परिवार को माता ने स्वप्न दिया और अपनी दिव्य मूर्तियां जो कई शताब्दियों से जंगलों में छुपी हुई थी उन्हें गाँव लावन पुरा में प्रतिस्थापना के लिए कहा जब कर्णवंशी समुदाय के परिवार के मुखिया परम श्रद्धेय रामगोपाल कटारे जी ने स्वप्न की वास्तविकता जानने के लिए जंगलो में ख़ोज की तो वास्तव में स्वप्न अनुरूप पाषाण की दो दिव्य प्राचीन मूर्तियों को प्राप्त किया जिनकी स्थापना गांव लावन पुरा में करा दी गई जो आज भी मौजूद है स्वप्न अनुरूप देवी ने अपना नाम त्रिकुटा वैष्णो देवी बताया था जिनकी तीन मूर्तियां है जिन्हें कई शताब्दी पूर्व हिंदूविरोधी आक्रमणों के कारण कहीं दिव्य मूर्तियों को खंडित न कर दिया जाए के भय से राज्य मंदिर से निकाल कर जंगलों में छुपा दिया था जिनमें से एक प्रतिमा सोने की है जो कि आना शेष है प्रतिमा स्थापित करने वाले परम श्रद्धेय रामगोपाल कटारे जी तो इस दुनिया में अब रहे नहीं किंतु उनका परिवार आज भी इसी इंतेज़ार में देवी के चरणों में लीन है कि एक दिन तीसरी प्रतिमा का भी आगमन होगा और उन्हें पूर्ण रूप में देवी वैष्णो रानी के प्रतिरूप के दर्शन का सौभाग्य मिलेगा निष्कर्षण असमंजस्य भरा इसलिए है कि देवी त्रिपुर सुंदरी को भी वैष्णो देवी का प्रतिरूप माना जाता है जिनकी प्रतिमा में सु-स्पष्ट तीन मुख की छवियां देखी जा सकती है और स्वप्न दे कर गांव लावन पुरा आईं दो दिव्य मूर्तियों को भी वैष्णो देवी का प्रतिरूप मानकर पूजा जा रहा है और कर्णवंशी परिवार तीसरी प्रतिमा के आगमन का इंतज़ार पूर्ण निष्ठा और विश्वाश के साथ आज भी कर रहा है , क्या त्रिपुर सुंदरी और गाँव लावन पुरा में स्थापित वैष्णो देवी की अधूरी प्रतिमाओं में कोई संबंध है यदि संभव है तो कर्णवंशी इससे अनजान क्यों है क्या इतिहास का अभाव और कविलियाई प्रथा इस भ्रम का कारण है या फ़िर इतिहास के अभाव में यह समुदाय भ्रमित हो गया है खैर देवी त्रिपुर सुंदरी को भी माता कालिका की ही भांति दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक माना जाता है तो इन दोनों रूपों को पूजने में इन्हें कोई आपत्ति नहीं किंतु प्रश्न इतिहास और परंपराओं के अभाव का है
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| महाकाली |
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| गढ़ कालिका |



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